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Sunday, September 18, 2016

Narayaneeyam - Dasakam 66 (Delighting the Gopikas)

Narayaneeyam - Dasakam 66 (Delighting the Gopikas) 

 https://youtu.be/gJG4DDPargc

 

http://youtu.be/uiMyIr7bYAY

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Dashaka 66
उपयातानां सुदृशां कुसुमायुधबाणपातविवशानाम् ।
अभिवाञ्छितं विधातुं कृतमतिरपि ता जगाथ वाममिव ॥१॥
उपयातानां who had come
सुदृशां the beautiful women
कुसुमायुध- (whom) Cupid's
बाण-पात- arrows strike
विवशानाम् (had made) helpless
अभिवाञ्छितं desire
विधातुं to fulfil
कृतमति:-अपि having decided though
ता: जगाथ to them spoke
वामम्-इव unfavourable like
Thou had decided to fulfil the desire of the beautiful women who had come to Thee. They were helpless as they were struck by Cupid's arrow for Thee. Yet Thou first spoke to them in an unfavourable manner.
गगनगतं मुनिनिवहं श्रावयितुं जगिथ कुलवधूधर्मम् ।
धर्म्यं खलु ते वचनं कर्म तु नो निर्मलस्य विश्वास्यम् ॥२॥
गगन-गतं waiting in the skies
मुनि-निवहं the host of sages
श्रावयितुं to make them hear
जगिथ (Thou) stated
कुल-वधू-धर्मम् the housewives' duties
धर्म्यम् खलु in accordance of Dharma indeed
ते वचनं Thy words
कर्म तु नो actions but not
निर्मलस्य of Thee who are pure
विश्वास्यम् (are) to be followed
To the hearing of the sages assembled in the skies, Thou stated the duties of the housewives, for the benefit of the world. Indeed, Thy words are to be followed for they are in accordance with the Dharma. But the actions of Thee who are ever pure, should not be practiced by others, because Thy actions do not always conform to the good and bad standards of the world.
आकर्ण्य ते प्रतीपां वाणीमेणीदृश: परं दीना: ।
मा मा करुणासिन्धो परित्यजेत्यतिचिरं विलेपुस्ता: ॥३॥
आकर्ण्य ते hearing Thy
प्रतीपां वाणीम्- unfavourable speech
एणीदृश: the doe eyed damsels
परं दीना: very much grief striken
मा मा do not O do not
करुणासिन्धो O Thou ocean of compassion
परित्यज-इति- foresake thus
अचिरं for long
विलेपु:-ता: pleaded they
On hearing Thy unfavourable speech, those doe eyed women were very much grief striken. For long did they plead saying 'O Thou ocean of compassion, do not, O do not foresake us.'
तासां रुदितैर्लपितै: करुणाकुलमानसो मुरारे त्वम् ।
ताभिस्समं प्रवृत्तो यमुनापुलिनेषु काममभिरन्तुम् ॥४॥
तासां रुदितै:- by their weeping
लपितै: (and) pleading
करुणा-आकुल- with pity moved
मानस: Thy mind
मुरारे त्वम् O Slayer of Mur! Thou
ताभि:-समम् with them
प्रवृत्त: set out
यमुना-पुलिनेषु on the Yamunaa sand banks
कामम्-अभिरन्तुम् desiring to sport freely
O Thou! Slayer of Mura! Moved with pity by their weeping and pleading, Thou set out to sport freely with them on the sand banks of Yamunaa river.
चन्द्रकरस्यन्दलसत्सुन्दरयमुनातटान्तवीथीषु ।
गोपीजनोत्तरीयैरापादितसंस्तरो न्यषीदस्त्वम् ॥५॥
चन्द्रकर- the moon light
स्यन्द-लसत्- flowing and shining
सुन्दर- beautifully
यमुना-तटान्त- on the Yamunaa banks
वीथीषु and the sand banks
गोपीजन- the Gopikaas
उत्तरीयै:- (by their) upper garment
आपादित-संस्तर: spread out bed
न्यषीद:-त्वम् sat down Thou
The sand banks of Yamunaa was lit by beautifully flowing and shining moon light. There Thou sat down on the bed which was made by the Gopikaas by spreading out their upper garment.
सुमधुरनर्मालपनै: करसंग्रहणैश्च चुम्बनोल्लासै: ।
गाढालिङ्गनसङ्गैस्त्वमङ्गनालोकमाकुलीचकृषे ॥६॥
सुमधुर्- (with) sweet
नर्म-आलपनै: playful talks
कर-संग्रहणै:-च and by hands holding
चुम्बन-उल्लासै: and by the joy of kisses
गाढ-आलिङ्गन-सङ्गै:- and by close hearty embraces
त्वम्- Thou
अङ्गना-लोकम्- the women folk
आकुली-चकृषे delighted immensely
By Thy sweet and playful talks, by holding of hands, by the joy of kisses, and by close hearty embraces, Thou delighted the women folk immensely.
वासोहरणदिने यद्वासोहरणं प्रतिश्रुतं तासाम् ।
तदपि विभो रसविवशस्वान्तानां कान्त सुभ्रुवामदधा: ॥७॥
वासो-हरण-दिने on the day when the clothes were stolen
यत्-वासो-हरणम् that stealing of clothes
प्रतिश्रुतं तासाम् was promised to them (to the gopis)
तत्-अपि विभो that also O Lord!
रस-विवश-स्वान्तानां to bliss overcome minds
कान्त O Charming One!
सुभ्रुवाम्- (to them) the beautiful eyed ones
अदधा: Thou gave (the promise)
On the day of the stealing of clothes, O Lord! Thou had promised to them the stealing of clothes (the removal of the sense of ego). That also, O charming One! Thou gave to the beautiful eyed women, whose minds were overcome with bliss.
कन्दलितघर्मलेशं कुन्दमृदुस्मेरवक्त्रपाथोजम् ।
नन्दसुत त्वां त्रिजगत्सुन्दरमुपगूह्य नन्दिता बाला: ॥८॥
कन्दलित- sprouting of
घर्म-लेशं perspiration drops(and with)
कुन्द-मृदु-स्मेर- jasmine like soft smile
वक्त्र-पाथोजम् and face like a lotus
नन्दसुत त्वां O Thee the son of Nanda
त्रिजगत्-सुन्दरम्- the most resplendent one in the worlds
उपगूह्य embracing
नन्दिता: बाला: were very delighted, the damsels
O Son of Nanda! The most resplendent one in the three worlds! Perspiration drops sprouted on Thy body. Thy lotus face was soft with a jasmine like smile. The damsels embracing Thee were very delighted.
विरहेष्वङ्गारमय: शृङ्गारमयश्च सङ्गमे हि त्वम् नितरामङ्गारमयस्तत्र पुनस्सङ्गमेऽपि चित्रमिदम् ॥९॥
विरहेषु- in seperation
अङ्गारमय: (Thou) are like burning charcoal
शृङ्गारमय:-च (and) love embodied
सङ्गमे in union
हि त्वम् indeed are Thou
नितराम्- absolutely
अङ्ग-अरमय: O Dear One! (Thou) gave delight
तत्र पुन:- there again
सङ्गमे-अपि in union also
चित्रम्-इदम् wonderful it is
In seperation with Thee, Thou are unbearable as a burning charcoal. In union indeed Thou are an absolute embodiment of love. O Dear One! Wonderful it indeed is that in union also, here again the women were delighted.
राधातुङ्गपयोधरसाधुपरीरम्भलोलुपात्मानम् ।
आराधये भवन्तं पवनपुराधीश शमय सकलगदान् ॥१०॥
राधा-तुङ्ग-पयोधर- Raadhaa's bulging breasts
साधु-परीरम्भ- nicely (to) embrace
लोलुप-आत्मानम् eager with a mind
आराधये भवन्तं (I) worship Thee
पवनपुराधीश O Lord of Guruvaayur!
शमय सकल-गदान् eradicate all the ailments.
O Lord of Guruvaayur! I worship Thee who are eager in mind to nicely embrace the bulging breasts of Raadhaa. I pray to Thee to eradicate all the ailments.



दशक ६६
उपयातानां सुदृशां कुसुमायुधबाणपातविवशानाम् ।
अभिवाञ्छितं विधातुं कृतमतिरपि ता जगाथ वाममिव ॥१॥
उपयातानां आई हुई को
सुदृशां सुनयनाओं को
कुसुमायुध- कुसुमायुध (कामदेव) के
बाण-पात- बाणों के आघात से
विवशानाम् विवश हुई को
अभिवाञ्छितं मनोवाञ्छित
विधातुं करने के लिए
कृतमति:-अपि कर के निश्चय भी
ता: जगाथ उनको कहा
वामम्-इव विपरीत की भांति
कामदेव के बाणों से आहत हो कर विवश हुई आपके पास आई हुई सुनयनाओं को उनका मनोवाञ्छित करने के लिए आप कृत निश्चय थे। फिर भी आपने उनको विपरीत भाव में कहा।
गगनगतं मुनिनिवहं श्रावयितुं जगिथ कुलवधूधर्मम् ।
धर्म्यं खलु ते वचनं कर्म तु नो निर्मलस्य विश्वास्यम् ॥२॥
गगन-गतं गगन में स्थित
मुनि-निवहं मुनि गण को
श्रावयितुं सुनाने के लिए
जगिथ (आपने) कहा
कुल-वधू-धर्मम् कुल वधुओं का धर्म
धर्म्यम् खलु धर्म के अनूकूल ही
ते वचनं आपके वचनों का
कर्म तु नो कर्मों का तो नहीं
निर्मलस्य (आप) परम निर्मल का
विश्वास्यम् अनुकरणीय है
गगन में स्थित मुनि गण को सुनाने के लिए आपने कुल वधुओं को उनके धर्म का उपदेश दिया। परम निर्मल आपके वचन सर्वदा धर्म सङ्गत होते हैं इस लिए अनुकरणीय हैं, किन्तु कर्म सर्वथा अलौकिक होने के कारण अनुकरणीय नहीं हैं।
आकर्ण्य ते प्रतीपां वाणीमेणीदृश: परं दीना: ।
मा मा करुणासिन्धो परित्यजेत्यतिचिरं विलेपुस्ता: ॥३॥
आकर्ण्य ते सुन कर आपकी
प्रतीपां वाणीम्- प्रतिकूल वाणी को
एणीदृश: मृगनयनी वे
परं दीना: अत्यन्त दु:खी (हो कर कहने लगीं)
मा मा नहीं नहीं
करुणासिन्धो हे करुणासिन्धो!
परित्यज-इति- परित्याग करें इस प्रकार
अचिरं बहुत समय तक
विलेपु:-ता: विलाप करते रहीं वे
आपकी प्रतिकूल वाणी सुन कर वे मृगनयनी गोपियां, अत्यन्त दु:खी हो कर कहने लगीं, 'हे करुणासिन्धो! हमारा परित्याग न करें, न करें।' इस प्रकार वे दीर्घ समय तक विलाप करती रहीं।
तासां रुदितैर्लपितै: करुणाकुलमानसो मुरारे त्वम् ।
ताभिस्समं प्रवृत्तो यमुनापुलिनेषु काममभिरन्तुम् ॥४॥
तासां रुदितै:- उन (गोपिकाओं) के रुदन से
लपितै: (और) करुण आग्रह से
करुणा-आकुल- करुणा से व्याकुल
मानस: मन वाले (आप)
मुरारे त्वम् हे मुरारे! आप
ताभि:-समम् उनके सङ्ग
प्रवृत्त: प्रस्तुत हो गए
यमुना-पुलिनेषु यमुना के तटों पर
कामम्-अभिरन्तुम् स्वेच्छा से रमण करने के लिए
हे मुरारे! उन गोपिकाओं के रुदन और करुण आग्रहों से करुणा द्रवित हुआ आपका मन विचलित हो गया। यमुना के तटों पर उनके सङ्ग स्वेच्छा से रमण करने के लिए आप प्रस्तुत हो गए।
चन्द्रकरस्यन्दलसत्सुन्दरयमुनातटान्तवीथीषु ।
गोपीजनोत्तरीयैरापादितसंस्तरो न्यषीदस्त्वम् ॥५॥
चन्द्रकर- चन्द्र किरणों की
स्यन्द-लसत्- स्निग्धता से सुशोभित
सुन्दर- सुन्दर
यमुना-तटान्त- यमुना के तट के किनारे की
वीथीषु वीथियों में
गोपीजन- गोपीजनों ने
उत्तरीयै:- अपने उत्तरीय से
आपादित-संस्तर: बिछा दिया बिस्तर
न्यषीद:-त्वम् (और) आप बैठ गए
यमुना के तट चन्द्र किरणो की स्निग्ध सुन्दरता भरी शोभा से आच्छादित थे। तटान्त की वीथियों मे गोपिजन ने अपने उत्तरीय से बिस्तर बिछा दिया। आप उस पर बैठ गए।
सुमधुरनर्मालपनै: करसंग्रहणैश्च चुम्बनोल्लासै: ।
गाढालिङ्गनसङ्गैस्त्वमङ्गनालोकमाकुलीचकृषे ॥६॥
सुमधुर्- अत्यन्त मधुर
नर्म-आलपनै: परिहास पूर्ण बातों से
कर-संग्रहणै:-च (परस्पर) हाथों के पकडने से
चुम्बन-उल्लासै: और चुम्बन के उल्लास से
गाढ-आलिङ्गन-सङ्गै:- प्रगाढ आलिङ्गनों से
त्वम्- आपने
अङ्गना-लोकम्- गोपिकाओं को
आकुली-चकृषे अत्यन्त आकुलित कर दिया
आपने गोपाङ्गनाओं को अपनी मधुर और हास्यपूर्ण बातों से, परस्पर हाथ पकडने से, चुम्बन के उत्साह से और प्रगाढ आलिङ्गनों से अत्यन्त आकुलित कर दिया।
वासोहरणदिने यद्वासोहरणं प्रतिश्रुतं तासाम् ।
तदपि विभो रसविवशस्वान्तानां कान्त सुभ्रुवामदधा: ॥७॥
वासो-हरण-दिने वस्त्रों के हरण के दिन
यत्-वासो-हरणम् जो वस्त्रों का हरण हुआ था
प्रतिश्रुतं तासाम् प्रतिज्ञा की थी उनसे (गोपियों से)
तत्-अपि विभो वह भी हे विभो!
रस-विवश-स्वान्तानां (आनन्द) रस से विवश चित्त वाली
कान्त हे कान्त!
सुभ्रुवाम्- सुभ्रू उनको
अदधा: दिया
हे विभो! वस्त्र हरण के दिन आपने, उन सुभ्रू गोपियों से, वस्त्र के हरण की प्रतिज्ञा की थी। हे कान्त! आपने आनन्द रस से विवश चित्त वाली गोपिकाओं को उस वस्त्र के (माया के आवरण का) हरण (का आनन्द) दिया।
कन्दलितघर्मलेशं कुन्दमृदुस्मेरवक्त्रपाथोजम् ।
नन्दसुत त्वां त्रिजगत्सुन्दरमुपगूह्य नन्दिता बाला: ॥८॥
कन्दलित- उभरे हुए
घर्म-लेशं स्वेद बिन्दुओं वाले
कुन्द-मृदु-स्मेर- कुन्द (पुष्प) के समान मधुर मुस्कान वाले
वक्त्र-पाथोजम् मुख पद्म वाले
नन्दसुत त्वां हे नन्द पुत्र! आपको
त्रिजगत्-सुन्दरम्- त्रिजगत में सर्वोत्तम सुन्दर को
उपगूह्य आलिङ्गन कर के
नन्दिता: बाला: परम आनन्दित हुई बालाएं
हे नन्द पुत्र! त्रिजगत में सर्वोच्च सुन्दर हैं। स्वेद बिन्दु युक्त, कुन्द कुसुम के समान मुस्कान से सुशोभित मुख पद्म वाले आपका आलिङ्गन कर के वे बालाएं अत्यन्त आनन्दित हुईं।
विरहेष्वङ्गारमय: शृङ्गारमयश्च सङ्गमे हि त्वम्
नितरामङ्गारमयस्तत्र पुनस्सङ्गमेऽपि चित्रमिदम् ॥९॥
विरहेषु- विरह के समय
अङ्गारमय: अङ्गारमय (दाहक)
शृङ्गारमय:-च और शृङ्गारमय
सङ्गमे समागम के समय (में)
हि त्वम् भी आप
नितराम्- सर्वथा
अङ्ग-अरमय: हे अङ्ग! रमण किया
तत्र पुन:- वहां फिर
सङ्गमे-अपि संगम में भी
चित्रम्-इदम् आश्चर्य है यह
विरह में आप अङ्गार स्वरूप (दाहक) प्रतीत होते हैं। और समागम के समय आप सर्वथा शृङ्गारमय (शीतल) प्रतीत होते हैं। हे अङ्ग! आप गोपियों से समागम के समय रागमय प्रतीत हुए। क्या आश्चर्य है?
राधातुङ्गपयोधरसाधुपरीरम्भलोलुपात्मानम् ।
आराधये भवन्तं पवनपुराधीश शमय सकलगदान् ॥१०॥
राधा-तुङ्ग-पयोधर- राधा के उतुङ्ग स्तनों का
साधु-परीरम्भ- भलि भांति आलिङ्गन करने के लिए
लोलुप-आत्मानम् लोलुप मन वाले (आपकी)
आराधये भवन्तं आराधना (करता हूं) आपकी
पवनपुराधीश हे पवनपुराधीश!
शमय सकल-गदान् शान्त करें व्याधियों को
राधा के उतुङ्ग पयोधरों का भलि भांति आलिङ्गन करने के लिए उतावले मन वाले हे पवनपुराधीश! मैं आपकी आराधना करता हूं। मेरी व्याधियों का शमन करें।

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