Followers

Saturday, September 17, 2016

Narayaneeyam - Dasakam 44 (Naming Ceremony)

Narayaneeyam - Dasakam 44 (Naming Ceremony) 

 https://youtu.be/b9ugvwEYQsw

 

http://youtu.be/6jGbbMr7Hb4
============
Dashaka 44
गूढं वसुदेवगिरा कर्तुं ते निष्क्रियस्य संस्कारान् ।
हृद्गतहोरातत्त्वो गर्गमुनिस्त्वत् गृहं विभो गतवान् ॥१॥
गूढम् secretly (said)
वसुदेव-गिरा the words of Vasudeva (directed by that)
कर्तुम् ते to do (perform) Thy
निष्क्रियस्य who are above all rites and rituals
संस्कारान् (Thy) sacraments
हृद्-गत-होरा-तत्व: an expert in astrology
गर्ग-मुनि: Garga Muni
त्वत्-गृहम् to Thy house
विभो O Lord!
गतवान् went
O All pervading Lord! Thou are above and beyond all ceremonies and rites. Yet, Garga Muni an expert at astronomy and astrology, went to Thy house at the secret request of Vasudeva, to perform sacraments for Thee.
नन्दोऽथ नन्दितात्मा वृन्दिष्टं मानयन्नमुं यमिनाम् ।
मन्दस्मितार्द्रमूचे त्वत्संस्कारान् विधातुमुत्सुकधी: ॥२॥
नन्द:-अथ Nanda, then
नन्दित-आत्मा delightfully
वृन्दिष्टम् the greatest of all
मानयन्-अमुम् honouring, this (Garga Muni)
यमिनाम् (greatest) of all the sages
मन्द्-स्मित-आर्द्रम्-ऊचे with a gentle smile said (requested)
त्वत्-संस्कारन् sacraments for Thee
विधातुम्-उत्सुक-धी: to perform (who) was eager
Nanda was very delighted and he honoured the greatest of all the sages Garga Muni, who was eager to perform the sacraments for Thee. He then, with a gentle smile requested the sage to perform the rites.
यदुवंशाचार्यत्वात् सुनिभृतमिदमार्य कार्यमिति कथयन् ।
गर्गो निर्गतपुलकश्चक्रे तव साग्रजस्य नामानि ॥३॥
यदुवंश- of the Yadu clan
आचार्यत्वात् being the priest
सुनिभृतम्-इदम्- very secretly this
आर्य कार्यम्-इति O Respected One (Nanda), should be done, thus
कथयन् गर्ग: saying, sage Garga
निर्गत-पुलक:- with horippillation
चक्रे तव performed, Thy with Thy elder brother's
साग्रजस्य नामानि naming (ceremony)
Sage Garga said,'O Respected Nanda, since I am the priest of the Yadu clan, this ceremony must be performed in great secrecy'. Saying so, with horripillations over his body he performed the naming ceremony of Thee and Thy elder brother.
कथमस्य नाम कुर्वे सहस्रनाम्नो ह्यनन्तनाम्नो वा ।
इति नूनं गर्गमुनिश्चक्रे तव नाम नाम रहसि विभो ॥४॥
कथम्-अस्य how, for this (child)
नाम कुर्वे naming should I do
सहस्र-नाम्न: हि- (who) having a thousand names indeed
अनन्त-नाम्न: वा or rather having endless names
इति नूनं thus surely (thinking)
गर्ग-मुनि:- Garga Muni
चक्रे तव नाम performed Thy naming
नाम रहसि in great secrecy
विभो O Lord!
How should I do the naming of this child? He indeed has thousands of names or rather endless names. O Lord! May be that sage Garga thinking like this, performed Thy naming in great secrecy.
कृषिधातुणकाराभ्यां सत्तानन्दात्मतां किलाभिलपत् ।
जगदघकर्षित्वं वा कथयदृषि: कृष्णनाम ते व्यतनोत् ॥५॥
कृषि-धातु- Krish, the root (verb)
ण-काराभ्याम् and with N suffix (by putting the two together)
सत्ता-आनन्द-आत्मताम् Existence Bliss (being Thy) real nature
किल-अभिलपत् indeed denoting
जगत्-अघ-कर्षित्वं वा or of (the people of) the world, the sins, drawing away
कथयत्-ऋषि: declaring, the sage
कृष्ण-नाम ते the name Krishna to Thee
व्यतनोत् gave
The putting together of the root of the verb Krish and the suffix N, denoting the combining of Existence and absolute Bliss, which is Thy real nature, declaring, the sage gave Thee the name Krishna. Also signifying the drawing away of the sins of the people of the world, the name Krishna was given to Thee.
अन्यांश्च नामभेदान् व्याकुर्वन्नग्रजे च रामादीन् ।
अतिमानुषानुभावं न्यगदत्त्वामप्रकाशयन् पित्रे ॥६॥
अन्यान्-च नाम-भेदान् and other different names
व्याकुर्वन्- giving (like Vaasudeva)
अग्रजे च राम-आदीन् and to Thy elder brother Raama etc (calling thus)
अतिमानुष-अनुभावं (of a) superhuman disposition
न्यगदत्- told (indicated)
त्वाम्-अप्रकाशयन् Thee not revealing
पित्रे to (Thy) father
The sage also gave Thee other different names like Vaasudeva. Then he gave the name Raama etc to Thy elder brother. Having done so, Garg Muni indicated to Thy having superhuman powers and disposition, to Thy father. Yet he did not fully reveal Thy real identity as Lord Himself.
स्निह्यति यस्तव पुत्रे मुह्यति स न मायिकै: पुन: शोकै: ।
द्रुह्यति य: स तु नश्येदित्यवदत्ते महत्त्वमृषिवर्य: ॥७॥
स्निह्यति य:-तव पुत्रे whoever loves your son
मुह्यति स न मायिकै: he will not be deluded by Maayaa
पुन: शोकै: (and) again by sorrows
द्रुह्यति य: he who goes against him
स तु नश्येत्- he certainly will be destroyed
इति-अवदत्- thus said
ते महत्त्वम्- Thy glory
ऋषिवर्य: the great sage
Who so ever loves your son will not be deluded by Maayaa and so will not be overcome by sorrows thereafter. And who so ever assails him will certainly perish.' Thus the great sage described Thy glory and greatness.
जेष्यति बहुतरदैत्यान् नेष्यति निजबन्धुलोकममलपदम् ।
श्रोष्यसि सुविमलकीर्तीरस्येति भवद्विभूतिमृषिरूचे ॥८॥
जेष्यति बहुतर-दैत्यान् will conquer many Asuras
नेष्यति निजबन्धु-लोकम्- will take his own people
अमल-पदम् to the pure realm
श्रोष्यसि will make you hear
सुविमल-कीर्ती:-अस्य- very pure fame, his
इति भवत्-विभूतिम्- thus Thy greatness
ऋषि:-ऊचे the sage spoke
He will conquer many Asuras and will take his own people to the realms of purity. You will have occassions to hear of his untainted pure fame.' Thus the sage spoke of Thy greatness.
अमुनैव सर्वदुर्गं तरितास्थ कृतास्थमत्र तिष्ठध्वम् ।
हरिरेवेत्यनभिलपन्नित्यादि त्वामवर्णयत् स मुनि: ॥९॥
अमुना-एव by him alone
सर्व-दुर्गम् तरितास्थ all obstacles (you) will cross
कृत-आस्थम्-अत्र placing your faith here
तिष्ठध्वम् remain
हरि:-एव-इति- Hari only is this
अनभिलपन्- not saying
इत्यादि in this manner
त्वाम्-अवर्णयत् Thee described
स मुनि: that sage
By his help alone you will be able to overcome all obstacles. Remain with your full faith placed in him.' Thus without saying that Thou were Hari, the sage thus described Thee.
गर्गेऽथ निर्गतेऽस्मिन् नन्दितनन्दादिनन्द्यमानस्त्वम् ।
मद्गदमुद्गतकरुणो निर्गमय श्रीमरुत्पुराधीश ॥१०॥
गर्गे-अथ then Garg Muni
निर्गते-अस्मिन् having left, he,
नन्दित-नन्द-आदि- delighted Nanda and others
नन्द्यमान:-त्वम् endeared Thou
मत्-गदम्- my ailments
उद्गत-करुण: (Thou) full of compassion
निर्गमय remove
श्रीमरुत्पुराधीश O Lord of Guruvaayur!
Then Garga Muni went away. Nanda and the others were very delighted and looked after Thee endearingly. O Lord of Guruvaayur! who are full of compassion, remove my ailments.


दशक ४४
गूढं वसुदेवगिरा कर्तुं ते निष्क्रियस्य संस्कारान् ।
हृद्गतहोरातत्त्वो गर्गमुनिस्त्वत् गृहं विभो गतवान् ॥१॥
गूढम् गुप्त रूप से
वसुदेव-गिरा वसुदेव के कहने से
कर्तुम् ते करने के लिये आपके
निष्क्रियस्य (आप जो) निष्क्रिय हैं (उनके)
संस्कारान् (नामकरण आदि) संस्कार (करने के लिये)
हृद्-गत-होरा-तत्व: हृदयस्थ हैं जिनके होरा तत्व (वे)
गर्ग-मुनि: गर्ग मुनि
त्वत्-गृहम् आपके घर को
विभो हे विभो!
गतवान् गये
हे विभो! वसुदेव के कहने से, गर्ग मुनि, जिनको होरा तत्व (ज्योतिष और खगोल शास्त्र) का गूढ ज्ञान था, गुप्त रूप से, आपके नामकरण आदि संस्कार सम्पन्न करने आपके घर गये। यद्यपि आप इन सब से परे हैं, निष्क्रिय हैं।
नन्दोऽथ नन्दितात्मा वृन्दिष्टं मानयन्नमुं यमिनाम् ।
मन्दस्मितार्द्रमूचे त्वत्संस्कारान् विधातुमुत्सुकधी: ॥२॥
नन्द:-अथ नन्द ने तब
नन्दित-आत्मा हर्षित मन से
वृन्दिष्टम् श्रेष्ठतम (उन का)
मानयन्-अमुम् सम्मान करके उनका
यमिनाम् मुनियों में (श्रेष्ठ)
मन्द्-स्मित-आर्द्रम्-ऊचे मन्द मुस्कान और आर्द्र वाणी से कहा
त्वत्-संस्कारन् आपके संस्कार
विधातुम्-उत्सुक-धी: करने के लिये उत्सुकता पूर्वक
नन्द ने हर्षित मन से मुनियों में श्रेष्ठतम गर्ग मुनि को देख कर उनका सादर सम्मान किया। फिर मुस्कुराते हुए आर्द्र वाणी में आपके संस्कार करने के लिये उत्सुक मुनि को आपके संस्कार करने के लिये कहा।
यदुवंशाचार्यत्वात् सुनिभृतमिदमार्य कार्यमिति कथयन् ।
गर्गो निर्गतपुलकश्चक्रे तव साग्रजस्य नामानि ॥३॥
यदुवंश- ''यदुवंश
आचार्यत्वात् के आचार्य होने के कारण
सुनिभृतम्-इदम्- अत्यन्त गुप्त रूप से यह
आर्य कार्यम्-इति हे आर्य! करना होगा" इस प्रकार
कथयन् गर्ग: कहते हुए गर्ग ने
निर्गत-पुलक:- होते हुए रोमाञ्चित
चक्रे तव किया तब
साग्रजस्य नामानि साथ में बडे भाई के नामकरण
गर्गाचार्य ने कहा कि, ' हे आर्य! युदुवंश का आचार्य होने के कारण मुझे यह कार्य अत्यन्त गुप्त रूप से करना होगा।' इस प्रकार कहते हुए पुलकित और रोमाञ्चित होते हुए उन्हों ने आपके अग्रज और आपका नाम करण किया।
कथमस्य नाम कुर्वे सहस्रनाम्नो ह्यनन्तनाम्नो वा ।
इति नूनं गर्गमुनिश्चक्रे तव नाम नाम रहसि विभो ॥४॥
कथम्-अस्य किस प्रकार इसका
नाम कुर्वे नाम करूं
सहस्र-नाम्न: हि- हजार नामों वाला ही
अनन्त-नाम्न: वा अनन्त नामों वाला अथवा
इति नूनं ऐसा निश्चय ही (सोचते हुए)
गर्ग-मुनि:- गर्ग मुनि ने
चक्रे तव नाम किया आपका नाम
नाम रहसि पूरे रहस्य से
विभो हे विभो!
गर्ग मुनि सोचने लगे कि 'इनके तो सहस्रों अथवा अनन्त नाम हैं। इनका किस प्रकार नामकरण करूं?' हे विभो! फिर उन्होंने अत्यन्त रहस्य पूर्वक आपका नामकरण किया।
कृषिधातुणकाराभ्यां सत्तानन्दात्मतां किलाभिलपत् ।
जगदघकर्षित्वं वा कथयदृषि: कृष्णनाम ते व्यतनोत् ॥५॥
कृषि-धातु- कृषि धातु
ण-काराभ्याम् (और) ण कार दोनों से
सत्ता-आनन्द-आत्मताम् (जो) सत्त और आनन्द स्वरूप हैं (आप)
किल-अभिलपत् निश्चय ही इङ्गित करते हैं
जगत्-अघ-कर्षित्वं वा (अथवा) जग के पापों को खींच लेने वाले
कथयत्-ऋषि: कहा ऋषि ने
कृष्ण-नाम ते कृष्ण नाम आपका
व्यतनोत् रखा
कृषि' धातु (क्रिया), सत्ता द्योतक है और 'ण' कार आनन्द द्योतक है। ये दोनों आपके ही रूप हैं। दोनों के योग से बने शब्द से 'जगत के पापों का कर्षण करने वाले, इङ्गित होता है। अतएव ऋषिवर ने आपका नाम 'कृष्ण' रख दिया।
अन्यांश्च नामभेदान् व्याकुर्वन्नग्रजे च रामादीन् ।
अतिमानुषानुभावं न्यगदत्त्वामप्रकाशयन् पित्रे ॥६॥
अन्यान्-च नाम-भेदान् अन्य अन्य और भी नामों के भेद
व्याकुर्वन्- को बताते हुए
अग्रजे च राम-आदीन् बडे भाई का 'राम' आदि (नाम रखा)
अतिमानुष-अनुभावं मानव मात्र से उन्नत व्यक्तित्व को
न्यगदत्- इङ्गित किया
त्वाम्-अप्रकाशयन् आपको अप्रकाशित करते हुए
पित्रे पिता से
मुनि ने अन्यान और भी नामों की व्याख्या की तथा आपके बडे भाई का नाम 'राम' आदि रखा। फिर आपके पिता के सामने आपके ब्रह्म स्वरूप को अप्रकाशित रखते हुए आपके अलौकिक व्यक्तित्व की ओर संकेत किया।
स्निह्यति यस्तव पुत्रे मुह्यति स न मायिकै: पुन: शोकै: ।
द्रुह्यति य: स तु नश्येदित्यवदत्ते महत्त्वमृषिवर्य: ॥७॥
स्निह्यति य:-तव पुत्रे स्नेह करेगा जो आपके पुत्र से
मुह्यति स न मायिकै: मोहित वह नहीं होगा मायिक
पुन: शोकै: पुन: शोकों से
द्रुह्यति य: द्रोह करेगा जो
स तु नश्येत्- वह तो नष्ट ही हो जायगा
इति-अवदत्- इस प्रकार कहा
ते महत्त्वम्- आपकी महानता को
ऋषिवर्य: ऋषिवर ने
ऋषिवर ने आपकी महानता को दर्शाते हुए कहा कि, 'जो आपके पुत्र से स्नेह करेगा वह माया जनित शोकों से मोहित नहीं होगा। लेकिन जो द्रोह करेगा वह तो नष्ट ही हो जायगा।'
जेष्यति बहुतरदैत्यान् नेष्यति निजबन्धुलोकममलपदम् ।
श्रोष्यसि सुविमलकीर्तीरस्येति भवद्विभूतिमृषिरूचे ॥८॥
जेष्यति बहुतर-दैत्यान् ''जीतेगा बहुत से असुरों को
नेष्यति निजबन्धु-लोकम्- ले जायेगा अपने बन्धु गण को
अमल-पदम् अमल पद पर
श्रोष्यसि सुनाई देगी
सुविमल-कीर्ती:-अस्य- अत्यन्त विमल कीर्ति इसकी
इति भवत्-विभूतिम्- इस प्रकार आपके ऐश्वर्य को
ऋषि:-ऊचे ऋषि ने बताया
यह बहुत से असुरों को जीतेगा, एवं अपने बन्धु गणों को अमल पद की प्राप्ति करवायेगा। इसकी अत्यन्त विमल कीर्ति सुनाई देगी', इस प्रकार ऋषि ने आपके ऐश्वर्य का वर्णन किया।
अमुनैव सर्वदुर्गं तरितास्थ कृतास्थमत्र तिष्ठध्वम् ।
हरिरेवेत्यनभिलपन्नित्यादि त्वामवर्णयत् स मुनि: ॥९॥
अमुना-एव इसी (पुत्र) के द्वारा
सर्व-दुर्गम् तरितास्थ सारे संकटों से पार हो जाओगे
कृत-आस्थम्-अत्र किये हुए आस्था इसमें
तिष्ठध्वम् स्थित रहो
हरि:-एव-इति- हरि ही है, यह
अनभिलपन्- नहीं बोलते हुए
इत्यादि इस प्रकार से
त्वाम्-अवर्णयत् आपका वर्णन किया
स मुनि: उन मुनि ने
इसी पुत्र के द्वारा आप लोग सभी संकटों से पार हो जायेंगे। इसमें आस्था बनाए रखिये।' इस प्रकार मुनि ने 'यह हरि ही है' ऐसा न कहते हुए भी आपकी महिमा का वर्णन किया।
गर्गेऽथ निर्गतेऽस्मिन् नन्दितनन्दादिनन्द्यमानस्त्वम् ।
मद्गदमुद्गतकरुणो निर्गमय श्रीमरुत्पुराधीश ॥१०॥
गर्गे-अथ गर्ग मुनि तब
निर्गते-अस्मिन् चले जाने पर उनके
नन्दित-नन्द-आदि- आनन्दित हुए नन्द आदि
नन्द्यमान:-त्वम् लाड प्यार करने लगे आपका
मत्-गदम्- मेरे कष्टों को
उद्गत-करुण: उद्दाम करुणा वाले
निर्गमय हटा दीजिये
श्रीमरुत्पुराधीश हे श्री मरुत्पुराधीश
गर्ग मुनि के चले जाने पर आनन्द विभोर नन्द आदि ने आपका खूब लाड प्यार किया। उद्दाम करुणा वाले, हे श्री मरुत्पुराधीश! मेरे कष्टों का निराकरण कीजिये।

No comments:

Post a Comment