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Friday, September 16, 2016

Narayaneeyam - Dasakam 11 (Sanaka enters Vaikuntha)




Narayaneeyam - Dasakam 11 (Sanaka enters Vaikuntha)

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Dashaka 11
क्रमेण सर्गे परिवर्धमाने
कदापि दिव्या: सनकादयस्ते ।
भवद्विलोकाय विकुण्ठलोकं
प्रपेदिरे मारुतमन्दिरेश ॥१॥
क्रमेण सर्गे gradually,as creation
परिवर्धमाने was progressing
कदापि once
दिव्या: सनकादय: ते those divine (sages) Sanaka and others
भवत्-विलोकाय to see Thee
विकुण्ठलोकं प्रपेदिरे reached Vaikunthloka
मारुतमन्दिरेश O Lord of Guruvaayur
O Lord of Guruvaayur! as creation progressed, the divine sages Sanaka and the others wanting to pay their respects to Thee went to Vaikuntha loka.
मनोज्ञनैश्रेयसकाननाद्यै-
रनेकवापीमणिमन्दिरैश्च ।
अनोपमं तं भवतो निकेतं
मुनीश्वरा: प्रापुरतीतकक्ष्या: ॥२॥
मनोज्ञ- the enchanting
नैश्रेयस-कानन-आद्यै: - Naishreyasha Kaanana (the garden by that name) and other
अनेक-वापी with many lakes
मणिमन्दिरै: - च and gems studded mansions
अनोपमं तं that incomparable
भवत: निकेतं Thy abode
मुनीश्वरा: प्रापु: - the sages reached
अतीत-कक्ष्या: having crossed the (six) ramparts
Crossing the six ramparts, the sages reached Thy unmatched abode with the Naishreyasha garden, many lakes and many mansions studded with gems.
भवद्दिद्दृक्षून्भवनं विविक्षून्
द्वा:स्थौ जयस्तान् विजयोऽप्यरुन्धाम् ।
तेषां च चित्ते पदमाप कोप:
सर्वं भवत्प्रेरणयैव भूमन् ॥३॥
भवत्-दिद्दृक्षून्- desirous of seeing Thee
भवनं विविक्षून् and about to enter (Thy) abode
द्वा:स्थौ two gatekeepers
जय: - तान् Jaya, them (the sages)
विजय: -अपि-अरुन्धाम् also Vijaya, stopped
तेषां च चित्ते and in their (sages') minds
पदम्-आप कोप: entered anger
सर्वं भवत्-प्रेरणया-एव all this by Thy prompting alone
भूमन् O Infinite One!
The sages were about to enter Thy abode to see Thee, when two gatekeepers, Jaya and Vijaya stopped them. This made the sages angry. All this happened by Thy prompting only.
वैकुण्ठलोकानुचितप्रचेष्टौ
कष्टौ युवां दैत्यगतिं भजेतम् ।
इति प्रशप्तौ भवदाश्रयौ तौ
हरिस्मृतिर्नोऽस्त्विति नेमतुस्तान् ॥४॥
वैकुण्ठलोक-अनुचित-प्रचेष्टौ for Vaikunthloka, is not fit, whose conduct
कष्टौ युवां wicked ones you two
दैत्य-गतिं भजेतम् state of Asuraas will attain
इति प्रशप्तौ thus cursed
भवत्-आश्रयौ तौ Thy servants they
हरि: -स्मृति: -न: -अस्तु- may we remember Hari (God)
इति नेमतु:-तान् thus beseeching prostrated before them
The two gatekeepers were cursed by the sages that as their conduct was not bifitting for them to be in Vaikunthloka, they may be embodied as Asuraas. Jaya and Vijaya, Thy sevants, beseeched the sages that their devotion to Thee may not falter. So saying, they prostrated to the sages.
तदेतदाज्ञाय भवानवाप्त:
सहैव लक्ष्म्या बहिरम्बुजाक्ष ।
खगेश्वरांसार्पितचारुबाहु-
रानन्दयंस्तानभिराममूर्त्या ॥५॥
तत्-एतत्-आज्ञाय that this knowing
भवान्-अवाप्त: Thou coming (out)
सह-एव लक्ष्म्या along with Laxmi
बहि: -अम्बुजाक्ष out, O Lotus eyed Lord!
खगेश्वर-अंस- on Garuda's shoulder
अर्पित-चारु-बाहु: - placing Thy charming arm
आनन्दयन्-तान्- delighting them (the sages)
अभिराम-मूर्त्या by Thy beautiful form
O Lotus-eyed Lord! Knowing all what had happened, Thou came out along with Laxmi, with Thy charming arm resting on Garuda. The sages were delighted to see Thy beautiful form.
प्रसाद्य गीर्भि: स्तुवतो मुनीन्द्रा-
ननन्यनाथावथ पार्षदौ तौ ।
संरम्भयोगेन भवैस्त्रिभिर्मा-
मुपेतमित्यात्तकृपं न्यगादी: ॥६॥
प्रसाद्य गीर्भि: with pleasing words
स्तुवत: मुनीन्द्रान्- to the sages as they were praising Thee,
अनन्य-नाथौ- who did not have any other refuge (other than Thee)
अथ पार्षदौ तौ to those two attendents
संरम्भयोगेन भवै:-त्रिभि:- by the path of confrontation, in three lives
माम्-उपेतम्- attain me
इति-आत्त-कृपम् thus overcome by compassion
न्यगादी: Thou said
As the sages were praising Thee with pleasing words, Thou told the two attendants, who had no refuge but Thee, to confront three lives as Asuras on earth. Overcome by compassion, then Thou granted them Thy attainment.
त्वदीयभृत्यावथ काश्यपात्तौ
सुरारिवीरावुदितौ दितौ द्वौ ।
सन्ध्यासमुत्पादनकष्टचेष्टौ
यमौ च लोकस्य यमाविवान्यौ ॥७॥
त्वदीय-भृत्यौ- Thy two attendents
अथ काश्यपात्-तौ then from sage Kashyapa, they both
सुरारि-वीरौ- as the gods' powerful enemies
उदितौ दितौ द्वौ were born of Diti the two
सन्ध्या-समुत्पादन- being begotten at evening
कष्ट-चेष्टौ having cruel nature
यमौ च and the twins (became)
लोकस्य यमौ-इव-अन्यौ for the worlds, like other two Yamas (the death god)
Thereafter,Thy two attendents took birth as great Asuras through Diti and her husband sage Kashyapa. They being begotted in the evening twilight, the twins became cruel in nature as if they were the gods of death for the world.
हिरण्यपूर्व: कशिपु: किलैक:
परो हिरण्याक्ष इति प्रतीत: ।
उभौ भवन्नाथमशेषलोकं
रुषा न्यरुन्धां निजवासनान्धौ ॥८॥
हिरण्य-पूर्व: कशिपु: किल-एक: (the name) Hiranya preceeding Kashipu, i.e. Hiranyakashipu was one
पर: हिरण्याक्ष इति प्रतीत: the other Hiranyaaksha thus was known
उभौ both
भवत्-नाथम्-अशेष-लोकं the whole world which has Thee as the master
रुषा in anger
न्यरुन्धां (they) tormented
निज-वासना-अन्धौ by their own vaasanaas being blinded
One son was known by the name of Hiranyakashipu and the other was known as Hiranyaaksha.They tormented the whole world, which has Thee as the master, in anger and blinded by their inherent evil tendencies.
तयोर्हिरण्याक्षमहासुरेन्द्रो
रणाय धावन्ननवाप्तवैरी ।
भवत्प्रियां क्ष्मां सलिले निमज्य
चचार गर्वाद्विनदन् गदावान् ॥९॥
तयो: - of them
हिरण्याक्ष-महासुरेन्द्र: Hiranyaaksha the great Asura
रणाय धावन्- a fight seeking
अनवाप्त-वैरी not getting any opponent
भवत्-प्रियां क्ष्मां Thy dear earth
सलिले निमज्य immersing in water
चचार गर्वात्-विनदन् roamed about, roaring in arrogance
गदावान् carrying a mace
Of the two of them, Hiranyaaksha, the great Asura, seeking a fight and not getting an opponent, immersed Thy dear earth into the water. He then roamed about roaring arrogantly, carrying a mace.
ततो जलेशात् सदृशं भवन्तं
निशम्य बभ्राम गवेषयंस्त्वाम् ।
भक्तैकदृश्य: स कृपानिधे त्वं
निरुन्धि रोगान् मरुदालयेश ॥१०।
तत: then
जलेशात् from the Lord of Waters (Varuna)
सदृशं भवन्तं as his equal Thee (are)
निशम्य hearing (thus)
बभ्राम (he) roamed about
गवेषयन् त्वाम् searching for Thee
भक्तैक-दृश्य: (O Thou) who can be seen only by Thy devotees
स कृपानिधे त्वं That Abode of Compassion,Thou
निरुन्धि रोगान् eradicate my ailments
मरुदालयेश O Lord of Guruvaayur!
Then coming to know from the god of the waters, Varuna, that Thou are the only match for him, Hiranyaaksha roamed about searching for Thee. O Thou, who can be attained only by Thy devotees, Thou the abode of Compassion, kindly eradicate my ailments, O Lord of Guruvaayur!.
http://youtu.be/K_3QDcPZSrM



दशक ११
क्रमेण सर्गे परिवर्धमाने
कदापि दिव्या: सनकादयस्ते ।
भवद्विलोकाय विकुण्ठलोकं
प्रपेदिरे मारुतमन्दिरेश ॥१॥
क्रमेण सर्गे क्रम से प्रजनन की
परिवर्धमाने वृद्धि होने पर
कदापि एक समय
दिव्या: सनकादय: ते दिव्य सनकादि वे लोग
भवत्-विलोकाय आपके दर्शन के लिये
विकुण्ठलोकं प्रपेदिरे वैकुण्ठलोक पहुंचे
मारुतमन्दिरेश हे मारुतमन्दिरेश!
हे मारुतमन्दिरेश! क्रम से प्रजनन की वृद्धि होने पर, वे दिव्य सनकादि किसी समय आपके दर्शन के लिये वैकुण्ठ लोक पहुंचे।
मनोज्ञनैश्रेयसकाननाद्यै-
रनेकवापीमणिमन्दिरैश्च ।
अनोपमं तं भवतो निकेतं
मुनीश्वरा: प्रापुरतीतकक्ष्या: ॥२॥
मनोज्ञ- मनोहर
नैश्रेयस-कानन-आद्यै: - नैश्रेयस कानन आदि,
अनेक-वापी अनेक बावलियों
मणिमन्दिरै: - च (और) मणि (जडित) मन्दिरों और
अनोपमं तं अनुपम उस
भवत: निकेतं आपके निवास को
मुनीश्वरा: प्रापु: - मुनीश्वर पहुंचे
अतीत-कक्ष्या: पार करके ( छ:) कक्षों को
नैश्रेयस कानन आदि काननो, अनेक बावलियों और मणि जडित मन्दिरों से मनोहर, छ: कक्षों को पार करके वे मुनिगण आपके उस अनुपम निवास स्थान को पहुंचे।
भवद्दिद्दृक्षून्भवनं विविक्षून्
द्वा:स्थौ जयस्तान् विजयोऽप्यरुन्धाम् ।
तेषां च चित्ते पदमाप कोप:
सर्वं भवत्प्रेरणयैव भूमन् ॥३॥
भवत्-दिद्दृक्षून्- आपके दर्शन के इच्छुक,
भवनं विविक्षून् (इसलिये) भवन में प्रवेश करने के इच्छुक,
द्वा:स्थौ द्वार पर स्थित
जय: - तान् जय (ने) उनको
विजय: -अपि-अरुन्धाम् विजय (ने) भी रोक लिया
तेषां च चित्ते और उनके चित्त में
पदम्-आप कोप: पैर रक्खा क्रोध ने
सर्वं भवत्-प्रेरणया-एव सब कुछ आप की प्रेरणा से ही
भूमन् हे भूमन!
हे भूमन! वे सनकादि आपके दर्शन के इच्छुक थे इसीलिये आपके भवन में प्रवेश करना चाहते थे। किन्तु द्वार पर जय और विजय ने उन्हे रोक लिया। तब उनके मन में क्रोध उत्पन्न हो गया। यह सब आपकी ही प्रेरणा से हुआ।
वैकुण्ठलोकानुचितप्रचेष्टौ
कष्टौ युवां दैत्यगतिं भजेतम् ।
इति प्रशप्तौ भवदाश्रयौ तौ
हरिस्मृतिर्नोऽस्त्विति नेमतुस्तान् ॥४॥
वैकुण्ठलोक-अनुचित-प्रचेष्टौ वैकुण्ठ लोक के अनुचित व्यवहार (वाले)
कष्टौ युवां दुष्ट (तुम) दोनों
दैत्य-गतिं भजेतम् दैत्य की गति को प्राप्त होगे
इति प्रशप्तौ इस प्रकार शापित
भवत्-आश्रयौ तौ आपके आश्रित वे दोनों
हरि: -स्मृति: -न: -अस्तु- भगवत स्मृति हमको रहे
इति नेमतु:-तान् ऐसी प्रार्थना की उनको
सनकादि ने उनको कहा कि उनका व्यवहार वैकुण्ठ लोक के अनुचित था। अतएव उन्होने शाप दिया कि वे दोनों दुष्ट दैत्य की गति को प्राप्त करें। आपके आश्रित उन दोनों ने प्रार्थना की कि उन्हे सदा भगवत स्मृति बनी रहे।
तदेतदाज्ञाय भवानवाप्त:
सहैव लक्ष्म्या बहिरम्बुजाक्ष ।
खगेश्वरांसार्पितचारुबाहु-
रानन्दयंस्तानभिराममूर्त्या ॥५॥
तत्-एतत्-आज्ञाय वह यह जान कर
भवान्-अवाप्त: आप पहुंचे
सह-एव लक्ष्म्या साथ ही लक्ष्मी के
बहि: -अम्बुजाक्ष बाहर, हे कमलनयन!
खगेश्वर-अंस- गरुड के कन्धे पर
अर्पित-चारु-बाहु: - रखे हुये सुन्दर भुजा
आनन्दयन्-तान्- आनन्द देते हुए उनको (सनकादि को)
अभिराम-मूर्त्या (अपनी) सुन्दर छबि के द्वारा
यह सब जान कर आप लक्ष्मी के साथ बाहर पहुंचे। हे कमलनयन! आपने गरुड के कन्धे पर अपनी सुन्दर भुजा रखी हुई थी। अपनी मनोहर छबि दिखा कर आपने सनकादि को बहुत आनन्दित किया।
प्रसाद्य गीर्भि: स्तुवतो मुनीन्द्रा-
ननन्यनाथावथ पार्षदौ तौ ।
संरम्भयोगेन भवैस्त्रिभिर्मा-
मुपेतमित्यात्तकृपं न्यगादी: ॥६॥
प्रसाद्य गीर्भि: प्रसन्न करके (अपनी) वाणी द्वारा
स्तुवत: मुनीन्द्रान्- स्तुति करते हुए मुनीन्द्रों को
अनन्य-नाथौ- अन्य नहीं थे नाथ जिनके (उन दोनों)
अथ पार्षदौ तौ तब उन दोनों पार्षदों (सेवकों) को
संरम्भयोगेन भवै:-त्रिभि:- क्रोध से कठोर होने के कारण जन्म तीन के द्वारा (के बाद)
माम्-उपेतम्- मुझको प्राप्त होगे
इति-आत्त-कृपम् इस प्रकार कृपा परिपूर्ण (आप) ने
न्यगादी: कहा
उन स्तुति करते हुए मुनीन्द्रों को आपने अपनी वाणी के द्वारा प्रसन्न किया। उन दोनों सेवकों को, जिनके और कोई आश्रय नहीं थे, कृपा से पूर्ण होकर आपने कहा कि उन्हे तीन जन्मों तक क्रोध से कठोर उस श्राप को सहना होगा, तत्पश्चात वे लोग आपको प्राप्त कर लेंगे।
त्वदीयभृत्यावथ काश्यपात्तौ
सुरारिवीरावुदितौ दितौ द्वौ ।
सन्ध्यासमुत्पादनकष्टचेष्टौ
यमौ च लोकस्य यमाविवान्यौ ॥७॥
त्वदीय-भृत्यौ- आपके ही सेवक (वे दोनों)
अथ काश्यपात्-तौ फिर कश्यप से, वे दोनों
सुरारि-वीरौ- असुर वीर
उदितौ दितौ द्वौ पैदा हुए दिति (के गर्भ) से दोनों
सन्ध्या-समुत्पादन- सन्ध्या काल में (गर्भ में) आने के कारण
कष्ट-चेष्टौ (वे) क्रूर कर्मों वाले थे
यमौ च वे दोनों जुडवां
लोकस्य यमौ-इव-अन्यौ लोक के लिये दूसरे यम (काल) के समान थे
तदनन्तर आपके उन दोनों सेवकों ने कश्यप और दिति के दो असुर वीर पुत्रों के रूप में जन्म लिया। सन्ध्या के समय गर्भ में आने के कारण वे अति क्रूर स्वभाव के थे। वे दोनों जुडवां भाई लोकों के लिये मानों दूसरे यम-काल ही थे।
हिरण्यपूर्व: कशिपु: किलैक:
परो हिरण्याक्ष इति प्रतीत: ।
उभौ भवन्नाथमशेषलोकं
रुषा न्यरुन्धां निजवासनान्धौ ॥८॥
हिरण्य-पूर्व: कशिपु: किल-एक: हिरण्य पहले कशिपु के, निश्चय ही एक
पर: हिरण्याक्ष इति प्रतीत: दूसरा हिरण्याक्ष इस प्रकार जाना जाता था
उभौ दोनों
भवत्-नाथम्-अशेष-लोकं आपही नाथ हैं समस्त लोकों के
रुषा (उन लोकों को) क्रोध में
न्यरुन्धां पीडित करते थे
निज-वासना-अन्धौ स्वयं की वासनाओं से अन्धे हो कर
एक का नाम हिरण्यकशिपु था और दूसरा हिरण्याक्ष के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस सम्पूर्ण लोक को जिसके आप ही स्वामी हैं, वे दोनों अपनी वासनाओं से अन्धे हो कर पीडित करते रहते थे।
तयोर्हिरण्याक्षमहासुरेन्द्रो
रणाय धावन्ननवाप्तवैरी ।
भवत्प्रियां क्ष्मां सलिले निमज्य
चचार गर्वाद्विनदन् गदावान् ॥९॥
तयो: - उन में से
हिरण्याक्ष-महासुरेन्द्र: हिरण्याक्ष्य महा असुर
रणाय धावन्- युद्ध के लिये ललकारता हुआ
अनवाप्त-वैरी न पा कर किसी वैरी को
भवत्-प्रियां क्ष्मां आपकी प्रिया पृथ्वी को
सलिले निमज्य जल में डुबो कर
चचार गर्वात्-विनदन् घूमता फिरा गर्व से दहाडता हुआ
गदावान् गदा लेकर
उनमें से महा असुर हिरण्याक्ष युद्ध के लिये लालायित होकर ललकारता हुआ घूमता फिरा। कोई योग्य शत्रु को न पा कर उसने आपकी प्रिया पृथ्वी को जल में डुबो दिया, और गदा ले कर गर्व से दहाडता हुआ घूमने लगा।
ततो जलेशात् सदृशं भवन्तं
निशम्य बभ्राम गवेषयंस्त्वाम् ।
भक्तैकदृश्य: स कृपानिधे त्वं
निरुन्धि रोगान् मरुदालयेश ॥१०।
तत: तब
जलेशात् वरुण (समुद्र) के भीतर से
सदृशं भवन्तं समान आपको (जान कर)
निशम्य सुन कर
बभ्राम घूमने लगा
गवेषयन् त्वाम् खोजते हुए आपको
भक्तैक-दृश्य: भक्तों को ही दिखने वाले
स कृपानिधे त्वं वह कृपानिधि आप
निरुन्धि रोगान् विनाश करिये रोगों का
मरुदालयेश हे मरुदालयेश
तब जलों के देवता वरुण से यह जान कर कि आप ही उसके सदृश हैं, वह रुक गया, और आपको खोजता हुआ घूमने लगा। केवल भक्तों को दृश्यमान, हे करुणानिधि, हे मरुदालयेश! ऐसे आप मेरे रोगों का विनाश करें।

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